पैरों की इन बंदिशों में ख़्वाब हर बिखरा हुआ
था समेटा तो बहुत लेकिन कहाँ यकजा हुआ
क्या पता था टूट कर ऐसे बिखर जाऊँगी मैं
दर्द से रिश्ता मेरा अब और भी गहरा हुआ
फिर भी यादों से तेरी ही महका रहता है ये दिल
क्यूँ तू ज़ेहन-ओ-क़ल्ब में अब तक भी है ठहरा हुआ
हर नज़ारे में तेरा ही अक्स दिखता है मुझे
है मोहब्बत में तेरी दिल भी मेरा दहका हुआ
अपनी किस्मत में बिछड़ना ही लिखा था क्या करें
खो के तुमको दिल मेरा अब तक भी है सहमा हुआ
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