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नया है दौर

                
                                                         
                            नया है दौर और नया है इंसाँ भी, समाज भी
                                                                 
                            
बदल चुके ज़माने के सभी हैं, कामकाज भी

सभी की देखा देखी इंसाँ दौड़ता ही जा रहा
कहाँ से लाया जाए इस बिमारी का, इलाज भी

नहीं सुकूँ मिला किसी को काम के भी बोझ से
खो दी है कल की चिंता में ख़ुशी मिली जो,आज भी

नहीं सुनाई देती है किसी को अपनों की सदा
नहीं रहा किसी भी रिश्ते में तो, एहतिजाज भी

कमाने के लिए बसें हैं दूर देश जा के सब
कहाँ है वक़्त पूछें जो किसी का अब, मिज़ाज भी
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39 मिनट पहले

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