माँ तेरी ममता के जैसा कुछ भी तो नहीं है इस जहां में,
याद आती है वो ममता जिसे ढूँढती रहती हूँ हर निशाँ में।
तुम्हारी ममता भरा हाथ था जब तक सिर पर बच्चे ही थे हम,
तुम्हारे जाने के बाद खो गया बचपन न जाने किस समाँ में।
ममता की मिल्कियत को सहेज कर रखा है आज भी सीने में,
तुम्हारी ममता के उजाले आज भी रौशन है मेरे आशियाँ में।
तुम जैसी ममतामई माँ पाकर पाई है मैंने सारे जहां की नेमतें,
तुम्हारे होने भर से बहारों का सा मौसम लगता था ख़िज़ाँ में।
तेरे आँचल के साए में दहकते सूरज की गर्मी लगती थी मद्धम,
आसमाँ के सारे सितारे उतर आते थे जैसे दिल- ओ- जाँ में।
काश आज भी तुम्हारी उँगली थाम कर सारे ग़म भुला दे 'पारुल',
ख़्वाबों में ही आकर तुम लोरी सुना दो माँ अपनी मधुर ज़ुबाँ में।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X