आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सोचा था साथ रहेंगे हम समंदर की तरह

                
                                                         
                            सोचा था साथ रहेंगे हम समंदर की तरह,
                                                                 
                            
तुमने मुझे बदल दिया पुराने कैलेंडर की तरह।

कहाँ रह गया है फ़र्क़ अब नूर-ओ-बेनूर में,
मेरे बाहर भी हो गया है मेरे अंदर की तरह।

मैं तो धुआँ हूँ, मेरा कोई वजूद कहाँ है,
तुम लगने लगे हो अब किसी पत्थर की तरह।

मैं रेशम नहीं हूँ कि लुभाऊँ बदन को,
मैं थोड़ा-थोड़ा चुभता हूँ खद्दर की तरह।

क़िस्मत में न था उम्र भर का साथ, फिर भी,
दोस्त बनकर मिलते रहेंगे मुक़द्दर की तरह।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर