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मेरा सबसे विश्वसनीय

                
                                                         
                            भीड़ से लौटकर
                                                                 
                            
मैंने पहली बार
अपने भीतर की
आहट सुनी।

तब जाना—
अकेलापन
रिक्तता नहीं,
एक अनकहा संवाद है।

मैं लोगों से
भागा नहीं था।
मैं केवल
उन चेहरों से लौटा था
जो मुखौटों से अधिक
कुछ नहीं थे।

हर मुस्कान में
अपनापन नहीं था।
कुछ आँखें
मुझे नहीं,
मेरी उपयोगिता को
देखती थीं।

तब प्रश्न उठा—
क्या दोष उनका था?
या मैं ही
अपेक्षाओं के रंग से
मनुष्यों को
पढ़ता रहा?

धीरे-धीरे
मैंने तन्हाई को
सज़ा नहीं,
साधना की तरह
स्वीकार किया।

वहाँ कोई शोर नहीं था,
केवल मेरी धड़कन थी।
कोई निर्णय नहीं,
केवल मेरा
निर्वस्त्र सत्य था।

अब समझता हूँ—
संबंध
निकटता से नहीं,
निष्कपटता से जन्मते हैं।
और जो स्वयं से
अपरिचित है,
वह किसी का
अपना कैसे होगा?

इसलिए
मैं अकेला नहीं हूँ।
मैं केवल
भीतर लौट आया हूँ।
जहाँ मौन
मेरा सबसे विश्वसनीय
सहचर है,
और मैं स्वयं
अपने लिए
अजनबी नहीं रहा।
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45 मिनट पहले

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