चेतना कोई दीप नहीं,
जो किसी से ज्योति ले।
वह स्वयं प्रभात है,
जिसके उदय से
दिशाएँ अर्थ पाती हैं।
उसे दर्पण की नहीं,
न दृष्टि की आवश्यकता।
उसका होना ही
उसका साक्षात्कार है,
उसका मौन परिचय।
वह स्वयं को
वस्तु की भाँति नहीं देखती।
वह तो वह दृष्टि है,
जिसमें समस्त दृश्य
अपने अर्थ ग्रहण करते हैं।
जहाँ द्रष्टा और दृश्य
एक-दूसरे में गल जाएँ,
वहीं से आरम्भ होता है
वह प्रदेश,
जिसे शब्द नहीं छूते।
द्वैत वहाँ
केवल स्मृति रह जाता है।
जैसे नदी
सागर में मिलकर
अपना नाम भूल जाए।
चेतना न बाहर है,
न भीतर।
वह तो वह निःशब्द आकाश है,
जिसमें अस्तित्व
स्वयं को सुनता है।
प्रश्न वहीं मिटते हैं,
जहाँ प्रश्नकर्ता भी
विलीन हो जाए।
शेष रहता है
केवल अविभाजित प्रकाश।
मैं उसे खोजता नहीं,
क्योंकि वही खोज है।
मैं उसे पाता नहीं,
क्योंकि वही प्राप्ति है।
वह स्वयंप्रकाश चेतना—
अनंत का मौन साक्षात्कार।
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