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हर एक अनुभव साधन बनता

                
                                                         
                            इच्छा का संसार अनूठा,
                                                                 
                            
आग्रह का हर बंधन झूठा।
मन चाहे अनुकूल व्यवस्था,
पर बिखरे यथार्थ की अवस्था।
जब चाहत को ठेस लगती,
तब अंतर्मन में कुंठा जगती।

परिस्थितियों से व्यर्थ लड़ाई,
मानव ने ही रीत बनाई।
संसार नहीं अनुचर किसी का,
यह वेग नियम है प्रकृति का।
धारा के विपरीत जो बहता,
वह जीवन भर दुःख ही सहता।

विराट व्यवस्था का यह मेला,
चलता रहे प्रवाह अकेला।
क्षण-क्षण बदले रूप यहाँ पर,
अमिट सत्य का भूप यहाँ पर।
आकांक्षा जब ढलती यथार्थ में,
तब सुख मिलता परमार्थ में।

बुद्धिमत्ता का मार्ग यही है,
जो घटित हुआ, वह सत्य सही है।
संघर्ष तजें, सामंजस्य अपनाएँ,
हर मोड़ पर मन को समझाएँ।
परिष्कृत करें अपनी आशा,
बदलेगी फिर जीवन की भाषा।

समत्व का जब उदय होता,
मन व्यर्थ के आँसू नहीं रोता।
भाग्य से फिर शिकवा न कोई,
जागृत होती शक्ति जो सोई।
संतोष की पावन भूमि मिले,
हृदय कमल हर समय खिले।

हर एक अनुभव साधन बनता,
दूर होती भीतर की जड़ता।
आत्मबल का दीप जलता है,
जीवन सहज पथ पर चलता है।
शांति का फिर वास होता,
मिट जाता अज्ञान का कुहासा।
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58 मिनट पहले

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