आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

और वही देखना, मुक्ति बन जाता है।

                
                                                         
                            मन के भीतर
                                                                 
                            
एक निरंतर प्रवाह है—
न शब्दों का,
न घटनाओं का,
केवल उठती-बैठती
असंख्य छायाओं का।

मैंने बहुत दिनों तक
उनसे वाद-विवाद किया,
हर विचार को
अंतिम सत्य समझकर
उसकी देहरी पर
अपना विवेक रख दिया।

फिर एक दिन
ज्ञात हुआ—
लहरों को रोकने से
समुद्र शांत नहीं होता;
उनके उठने का रहस्य
देखने से खुलता है।

तब मैंने
अपने भीतर
एक मौन स्थान खोजा,
जहाँ न निर्णय था,
न पक्ष,
न प्रतिपक्ष।

वहीं बैठकर देखा—
विचार आते हैं,
आकाश में उड़ते पक्षियों की भाँति;
कुछ ठहरते हैं,
कुछ विलीन हो जाते हैं,
और आकाश अपरिवर्तित रहता है।

अब मैं उत्तर नहीं खोजता,
न किसी अंतिम निष्कर्ष का यात्री हूँ।
केवल जागरूकता की
धीमी ज्योति में
स्वयं को देखता हूँ—
और वही देखना, मुक्ति बन जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर