मन के भीतर
एक निरंतर प्रवाह है—
न शब्दों का,
न घटनाओं का,
केवल उठती-बैठती
असंख्य छायाओं का।
मैंने बहुत दिनों तक
उनसे वाद-विवाद किया,
हर विचार को
अंतिम सत्य समझकर
उसकी देहरी पर
अपना विवेक रख दिया।
फिर एक दिन
ज्ञात हुआ—
लहरों को रोकने से
समुद्र शांत नहीं होता;
उनके उठने का रहस्य
देखने से खुलता है।
तब मैंने
अपने भीतर
एक मौन स्थान खोजा,
जहाँ न निर्णय था,
न पक्ष,
न प्रतिपक्ष।
वहीं बैठकर देखा—
विचार आते हैं,
आकाश में उड़ते पक्षियों की भाँति;
कुछ ठहरते हैं,
कुछ विलीन हो जाते हैं,
और आकाश अपरिवर्तित रहता है।
अब मैं उत्तर नहीं खोजता,
न किसी अंतिम निष्कर्ष का यात्री हूँ।
केवल जागरूकता की
धीमी ज्योति में
स्वयं को देखता हूँ—
और वही देखना, मुक्ति बन जाता है।
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