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वही निरंतर आगे बढ़ा।

                
                                                         
                            .यह पाषाण-सा हठ,
                                                                 
                            
यह स्वयं में सिमटी जड़ता,
शक्ति नहीं,
अस्तित्व का भ्रम है।

झंझावातों के सम्मुख
जो तना रहा अविचल,
वह टूट गया;
अहंकार की सीमा यही है।

किंतु जो झुका,
जिसने संवेदनशीलता चुनी,
वही बचा रहा,
वही समय को जीत सका।

प्रतिरोध का अर्थ
केवल टकराना नहीं;
परिस्थितियों के सांचे में
सहज ढल जाना है।

जीवन कोई नियत पथ नहीं,
एक अनियोजित यात्रा है;
यहाँ हर मोड़ पर
स्वीकारना ही सत्य है।

थपेड़े संकटों के
जब-जब प्रहार करेंगे,
तब पाषाणवत कठोरता
मिट्टी में मिल जाएगी।

जीवटता पनपती है
नित नए अनुभवों से;
जो सीखता रहा,
वही निरंतर आगे बढ़ा।

हे मन! त्याग यह जड़ता,
जल जैसी तरलता अपना;
बहते रहने में ही
सृजन की अमरता है।

.
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59 मिनट पहले

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