मैं स्वयं से पूछता हूँ—
क्या सचमुच कोई पथ होता है,
या हम ही अपने भय पर
दिशाओं के नाम लिख देते हैं?
कितनी बार प्रतीक्षा ने
मुझसे अधिक जीवन जिया है;
मैं संकेतों की राह देखता रहा,
और समय आगे बढ़ता रहा।
निश्चितता का कोई दीप
किसी मोड़ पर नहीं जलता;
अधिकांश यात्राएँ तो
अधूरे विश्वास से आरम्भ होती हैं।
कौन जानता है
कौन-सा पथ सत्य है?
किन्तु यह भी सत्य है कि
स्थिरता कोई उत्तर नहीं।
तब भीतर एक स्वर उठता है—
चलो, चाहे धुंध साथ चले;
क्योंकि गति की अपनी प्रज्ञा है,
और अनुभव का अपना प्रकाश।
तभी समझ आता है—
जीवन गंतव्य का नहीं,
उस साहस का नाम है
जो अज्ञात की ओर बढ़ता है;
अर्थ कहीं प्राप्त नहीं होता,
वह प्रथम कदम के साथ जन्म लेता है।
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