प्रतीक्षा की भी अपनी
एक निःशब्द भाषा होती है,
जो शब्दों से नहीं,
धड़कनों के अंतराल में
धीरे-धीरे लिखी जाती है।
कभी कोई स्मृति
साँझ के धुँधलके-सी उतरती है,
और मन के निर्जन तट पर
एक अनदेखी उपस्थिति का
मृदु स्पर्श छोड़ जाती है।
दिन समय की धारा में
बहते चले जाते हैं,
पर कुछ संबंध
ऋतुओं के अधीन नहीं होते;
वे भीतर ही भीतर
अपना काल स्वयं रचते हैं।
कई बार आँखें
क्षितिज तक फैले रिक्त आकाश को देखती हैं,
किन्तु आशा का एक पक्षी
थके हुए पंखों के साथ भी
हृदय में बसेरा बनाए रखता है।
यह आवश्यक नहीं
कि हर प्रतीक्षा का अंत मिलन हो;
कुछ राहें केवल इसलिए सुंदर हैं
कि उन पर चलते हुए
मन स्वयं को पहचान लेता है।
और तब समझ आता है—
प्रेम का सबसे उज्ज्वल रूप
अधिकार में नहीं,
उस धैर्य में बसता है
जो अनुपस्थिति को भी
एक पवित्र उपस्थिति बना देता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X