जब-जब मनुज ने गर्व भरा,
अपने ही निर्मित विस्तारों पर,
वन की निस्तब्ध प्रार्थनाओं को
रखा धूल-धूसरित द्वारों पर।
तब जीवन के अंतर-स्रोतों में
एक सूक्ष्म अँधेरा उतर गया।
नदियाँ केवल जल न थीं,
वे समय की बहती चेतना थीं;
पर्वत केवल पत्थर न थे,
वे धैर्य की मौन साधना थे।
पर हमने उनके अर्थ भुलाकर
केवल उपयोग का पाठ पढ़ा।
आकाश के विस्तृत नील पट पर
कितने स्वप्न अंकित होते थे,
पत्तों की थरथर कंपन में
अज्ञात संदेश झरते थे।
अब कोलाहल के घने कुहासे में
वह सूक्ष्म संगीत खो गया।
सभ्यता की चकाचौंध ने
दृष्टि को तो विस्तृत कर डाला,
पर अंतर्मन के श्रवण-कक्ष से
अनुभूति का स्वर दूर हुआ।
बाहर वैभव का उत्सव जागा,
भीतर का दीप क्षीण हुआ।
प्रकृति पर अधिकार नहीं,
उसके संग चलना ही प्रगति है;
जो मिट्टी से संवाद रखे,
वही जीवन की सच्ची गति है।
अन्यथा उपलब्धियों के शिखरों पर
मनुष्य स्वयं से ही दूर खड़ा है।
आओ फिर से सीखें सुनना—
पवन की धीमी पदचापों को,
सरिता के निर्मल एकांत को,
वन की हरित प्रतिज्ञाओं को।
क्योंकि जो प्रकृति का मान रखे,
वही अपनी आत्मा को बचाए रखता है॥
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