मैंने देखा है—
धरती
अपने लिए
बहुत कम माँगती है।
एक बीज,
थोड़ी-सी नमी,
और प्रकाश की एक किरण—
इतने में ही
वह हरियाली का स्वप्न रच लेती है।
पर मेरे भीतर
एक दूसरा प्रदेश भी है,
जहाँ इच्छाएँ
अपने ही पदचिह्नों का पीछा करती हुई
दूर निकल जाती हैं,
और मैं
हर प्राप्ति के बाद
एक नए अभाव के सामने खड़ा मिलता हूँ।
तब कोई मौन स्वर पूछता है—
क्या सचमुच
रिक्तता बाहर है,
या वह भीतर की उस जगह में है
जहाँ मैंने
‘पर्याप्त’ शब्द को
प्रवेश नहीं करने दिया?
मैं ठहरकर देखता हूँ—
सुख कोई शिखर नहीं,
जिसे जीतना हो;
वह तो एक शांत सरोवर है
जो तब दिखाई देता है
जब आकांक्षाओं की धूल
बैठ जाती है।
संग्रह की अंधी सुरंगों में
बहुत दूर तक चलने के बाद
मैंने जाना—
स्वामित्व का विस्तार
मनुष्य को बड़ा नहीं करता,
कभी-कभी
वह उसे
अपने ही केंद्र से दूर ले जाता है।
और तब
विवेक की एक छोटी-सी लौ
अंधकार के समस्त तर्कों को
निरस्त कर देती है।
उस प्रकाश में
मैं स्वयं से कह पाता हूँ—
जो है,
यदि उसे देख सकूँ,
तो शायद
अनंत की खोज नहीं,
पर्याप्त की पहचान ही
जीवन का सबसे दुर्लभ रहस्य है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X