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शिखरों पर भी पहुँचकर

                
                                                         
                            जीवन क्षणभंगुर स्वप्न-सा,
                                                                 
                            
बहता नित्य प्रवाह।
जो ठहरा, वह रेत हुआ;
जो बहा, वही अथाह॥

परिवर्तन का चक्र ही,
जग का शाश्वत धर्म।
पत्ते झरते, फूल खिलें—
यही प्रकृति का कर्म॥

समय किसी का सखा नहीं,
न उसका अनुराग।
जो उससे बँधकर रह गया,
खो बैठा निज भाग॥

शिखरों पर भी पहुँचकर,
मत खोना आधार।
धरती से जुड़ा वृक्ष ही,
छूता है अम्बर-पार॥

मोह घटे तो दृष्टि में,
सत्य स्वयं मुस्काए।
अंतर का निर्मल दर्पण,
जीवन-पथ दिखलाए॥

जीवन केवल पंथ है,
पथिक नहीं अधिकार।
धरती से जो जुड़ गया,
उसका हुआ विस्तार।
विनय बने जिसके चरण,
उसका ऊँचा संसार॥
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41 मिनट पहले

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