जीवन क्षणभंगुर स्वप्न-सा,
बहता नित्य प्रवाह।
जो ठहरा, वह रेत हुआ;
जो बहा, वही अथाह॥
परिवर्तन का चक्र ही,
जग का शाश्वत धर्म।
पत्ते झरते, फूल खिलें—
यही प्रकृति का कर्म॥
समय किसी का सखा नहीं,
न उसका अनुराग।
जो उससे बँधकर रह गया,
खो बैठा निज भाग॥
शिखरों पर भी पहुँचकर,
मत खोना आधार।
धरती से जुड़ा वृक्ष ही,
छूता है अम्बर-पार॥
मोह घटे तो दृष्टि में,
सत्य स्वयं मुस्काए।
अंतर का निर्मल दर्पण,
जीवन-पथ दिखलाए॥
जीवन केवल पंथ है,
पथिक नहीं अधिकार।
धरती से जो जुड़ गया,
उसका हुआ विस्तार।
विनय बने जिसके चरण,
उसका ऊँचा संसार॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X