कभी-कभी कुछ चेहरे
इतने अपने लगते हैं,
मानो वर्षों से
मन के आँगन में बसे हों।
उनकी सहज मुस्कान में
आत्मीयता झलकती है,
उनकी वाणी में
विश्वास का स्वर सुनाई देता है।
धीरे-धीरे उनका होना
जीवन का हिस्सा बनता है,
और उनकी उपस्थिति
एक मधुर आदत-सी लगती है।
हम निस्संकोच होकर
मन के द्वार खोल देते हैं,
और अनदेखे भविष्य में
अपेक्षाओं के दीप धर देते हैं।
किन्तु समय का दर्पण
भ्रम अधिक नहीं ढोता,
वह संबंधों का सत्य
एक दिन अवश्य दिखा देता है।
तब ज्ञात होता है—
हर निकट खड़ा व्यक्ति
मन की पीड़ा का
सहभागी नहीं होता।
कुछ लोग साथ चलकर भी
दूरी ही रचते रहते हैं,
और कुछ अपरिचित
मौन में भी साथ निभा जाते हैं।
अंततः समझ में आता है—
अपनापन शब्दों से नहीं,
निष्ठा और संवेदना से जन्मता है;
कई बार पराये ही
अपनों से अधिक अपने निकलते हैं।
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