साँस चलती है निरंतर,
इसलिए ही जी रहे हैं;
गहन एकाकी अधर से,
मौन का विष पी रहे हैं।
सत्य पूछो तो धरा पर,
रिक्त अब संसार सारा;
शेष केवल बह रही है,
काल की सुस्त चालक धारा।
व्यर्थ ही मन को लुभाते,
खोजते झूठी खुशी हम;
धूल की परतों तले अब,
ढूँढते अपनी हँसी हम।
लौ प्रज्वलित रखने को केवल,
तितलियों के संग उड़ते;
किन्तु अंततः अकेले,
शून्य की ही ओर मुड़ते।
दिन विलीन होते सतत ही,
बन रहे हैं उम्र की कड़ियाँ;
मृत्यु की वेदी पर सजतीं,
साँस की ये शेष घड़ियाँ।
बाँधकर यादों की गठरी,
चल रहा गतिमान राही;
दे रही प्रतिपल ढलती संध्या,
इस विवशता की गवाही।
बह रही अविरल निरंतर,
एक निशब्द शांत नदिया;
घोलकर अपने हृदय में,
सैकड़ों मायूस सदियाँ।
वेग भी जिसका थमा है,
शोर का कोई न ठाँव;
ढूँढता अब मौन जल यह,
एक तट, कोई विरामी गाँव।
लम्हे हैं कुछ धूप-छाँह के,
नाम जिनका ज़िन्दगी है;
चल रहे पग थक चुके जो,
यह विवशता-बन्दगी है।
सफ़र का अंत निश्चित है मगर,
जब तक बहाव है तब तक डगर;
बह रहे हैं हम इसी संग,
त्यागकर सारा प्रखर रंग।
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