समय कोई शाश्वत सत्य नहीं,
यह चेतना का एक विराट भ्रम है।
बाहर जो निरंतर बदल रहा है,
वह नियति है या यांत्रिक प्रवाह—
यह जानना इस मन के वश में नहीं।
बदलना ही काल का स्वभाव है,
जैसे अंधकार का प्रकाश में खोना।
पर इस महापरिवर्तन के चक्र में,
जो सत्य की तरह कौंध जाता है—
वह बस एक ठहरा हुआ संक्षिप्त पल है।
मैं इस एकांत में स्वयं से पूछता हूँ:
क्या मेरी सत्ता हर क्षण खंडित है?
वक्त का बदलना केवल एक सूचना है,
पर असली सत्य तो वह मौन है—
जो दो क्षणों के बीच घटित होता है।
लम्हे ठहरते नहीं, हम रोक लेते हैं—
अपनी आकांक्षाओं के तंग पिंजरे में।
एक अनकही बात, एक अधूरी दृष्टि,
काल की इस अनंत प्रदर्शनी में—
बस कुछ शाश्वत लगने वाले चित्र हैं।
यह ब्रह्मांड किसी विधाता की रचना है,
या केवल एक आकस्मिक शून्यता का विस्तार?
वक्त तो बस एक तटस्थ गवाह है,
जो गुज़र जाता है हमारी पराजयों को लाँघता—
बिना किसी प्रश्न का उत्तर दिए।
दर्पण में जो अजनबी चेहरा है,
वह वक्त के थपेड़ों की परिणति है।
इस अंतहीन और लक्ष्यहीन यात्रा में,
यदि कुछ सच है, तो बस यह बोध—
कि कुछ लम्हे ही हमें जीवंत रखते हैं।
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