समुद्र का अंधकार
मुझे कभी भयावह नहीं लगा।
जो जल की अतल परतों में उतरते हैं,
वे कम-से-कम अपने प्रश्नों का पीछा करते हुए
किसी अज्ञात निष्कर्ष तक पहुँचते हैं।
विनाश भी वहाँ एक प्रकार की पूर्णता है,
एक स्वीकृत परिणाम।
पर मैं उन पदचिह्नों को देखता हूँ
जो भीगी रेत पर बहुत दूर तक जाते हैं
और फिर अचानक लौट आते हैं।
जैसे किसी ने लहरों की पहली पुकार सुनकर
अपने ही भीतर के द्वार बंद कर लिए हों।
असंख्य यात्राएँ इसी प्रकार
आरंभ के निकट ही समाप्त हो जाती हैं।
मैं स्वयं से पूछता हूँ—
क्या पराजय वास्तव में गिर जाने में है,
या उस क्षण में
जब मन संभावना के विस्तृत आकाश को छोड़
सुरक्षित संकोच की शरण ले लेता है?
कितने जीवन ऐसे ही बीत जाते हैं,
अपने ही संदेहों की चौखट पर बैठे हुए।
गहराइयाँ तो कम-से-कम
मनुष्य से उसका समर्पण माँगती हैं;
किन्तु किनारे पर खड़ा भय
धीरे-धीरे उसकी दृष्टि हर लेता है।
वह डूबता नहीं,
फिर भी किसी अदृश्य रिक्ति में
प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा विलीन होता रहता है।
आज जब मैं अपने भीतर झाँकता हूँ,
तो पाता हूँ कि समुद्र बाहर नहीं, भीतर है।
मंज़िल भी कोई तट नहीं,
केवल आगे बढ़ते रहने की एक जिद है।
और सबसे गहरा शोक यही है—
कि मनुष्य लहरों से नहीं हारता,
कई बार वह अपने ही अनकहे भय के सामने
निस्तब्ध खड़ा रह जाता है।
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