आज जब मैं
अपने भीतर झाँकता हूँ,
तो पाता हूँ—
मुझे पथ की नहीं,
उस निस्तब्धता की चिंता है
जहाँ कोई प्रतिरोध शेष नहीं।
क्या सचमुच सरलता
अनुग्रह का संकेत है?
या फिर वह एक ऐसा विस्तार है
जहाँ इच्छाएँ तो चलती रहती हैं,
किन्तु आत्मा
कहीं पीछे छूट जाती है?
मैंने देखा है—
वृक्ष की जड़ों को
अंधकार से संवाद करना पड़ता है;
और नदी को
अपना स्वर पाने के लिए
शिलाओं से उलझना पड़ता है।
शायद विकास
किसी शिखर पर पहुँचने का नाम नहीं,
बल्कि उन प्रश्नों के साथ जीने का साहस है
जो हर मोड़ पर
हमारे निश्चित उत्तरों को
खंडित कर देते हैं।
इसलिए अब
बाधाओं से भय नहीं होता।
वे मेरे मार्ग की रुकावट नहीं,
मेरे भ्रमों की परीक्षा हैं;
वे बताती हैं
कि यात्रा अभी जीवित है।
और जिस दिन
सब कुछ सहज हो जाएगा,
उस दिन मैं गंतव्य नहीं,
अपनी दिशा पर प्रश्न करूँगा;
क्योंकि संभव है
वही दिन हो
जब मैंने आगे बढ़ना छोड़ दिया हो।
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