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मुक्ति थकावट में नहीं, दृष्टिकोण में है।

                
                                                         
                            बाहर जो पसरा है
                                                                 
                            
वह सत्य नहीं है,
वह केवल एक प्रतिध्वनि है
मेरे भीतर उठते
मौन कोलाहल की।

सामने खड़ी है
एक ही कठोर दीवार,
कोई इसे देख टूट गया,
कोई इसके साये में ही
नया रास्ता ढूँढ़ने लगा।

परिस्थिति तो तटस्थ है,
वह कब कहती है
कि मैं दुःख हूँ या सुख?
यह तो मेरी अपनी व्याख्या है
जो उसे रंग देती है।

चलते-चलते पैर नहीं थकते,
थक जाता है यह जीव
हर अनजाने मोड़ परप
जीवन का एक नया अर्थ
खोजते-खोजते।

अंधेरा बाहर कहीं नहीं,
न ही कोई शाश्वत उजाला है,
यह तो बस एक दृष्टि है,
जो स्वयं में समेटे है
नकार और स्वीकार का द्वंद्व।

प्राचीन विचार ने सच ही कहा था—
यह चित्त ही तो संसार है,
हम जिसे यथार्थ मान बैठे हैं,
वह और कुछ नहीं
चेतना का बुना हुआ जाल है।

मैं स्वयं से पूछता हूँ
इस एकांत क्षण में,
क्या मैं परिस्थितियों का दास हूँ
या अपनी ही धारणाओं का
एक अनसुलझा कैदी?

अब मैं देखता हूँ
मौन और शांत भाव से,
भीतर बदलती हुई दुनिया को,
क्योंकि मैं जान गया हूँ—
मुक्ति थकावट में नहीं, दृष्टिकोण में है।
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16 minutes ago

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