भीतर
दो दिशाएँ थीं।
एक मुझे
दुनिया की ओर बुलाती रही,
दूसरी
मुझी तक लौटाती रही।
मन ने कहा—
चलो वहाँ,
जहाँ अधिक प्रकाश है।
पर आत्मा ने पूछा—
क्या वह प्रकाश है,
या केवल
आँखों का आकर्षण?
मैंने
इच्छाओं को देखा।
वे नदी नहीं थीं,
रेत पर बहती
क्षणिक लहरें थीं।
हर लहर के बाद
प्यास शेष रही।
फिर मैंने
मौन को सुना।
वह बोलता नहीं था,
किन्तु उसके भीतर
एक ऐसा उत्तर था
जिसे कोई तर्क
पराजित नहीं कर सकता था।
मैं किसे मानूँ?
उस मन को
जो प्रतिदिन
एक नया आकाश रचता है,
या उस अंतरस्वर को
जो केवल
एक सत्य पर
स्थिर रहता है?
धीरे-धीरे समझा—
युद्ध संसार से नहीं,
उस शोर से है
जो भीतर
मेरी ही आकांक्षाओं ने
उगा रखा है।
विजय किसी और पर नहीं,
अपने ही आग्रहों पर है।
जब मन
आत्मा के पीछे चला,
निर्णय सरल नहीं हुए,
किन्तु निर्मल हो गए।
मार्ग छोटा नहीं हुआ,
पर बोझ
अचानक हल्का हो गया।
अब
मैं इच्छाओं का
अंत नहीं खोजता।
केवल इतना चाहता हूँ—
जब अंतिम क्षण आए,
मेरे भीतर
मन का कोलाहल नहीं,
आत्मा का मौन
शेष रहे।
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