अरुण-रश्मि के प्रथम कम्प में,
माँ, तुम नव जीवन की वाणी।
जड़ तम के निस्तब्ध हृदय में,
जागी तुमसे प्रथम कहानी॥
जब शून्य दिशाएँ सोती थीं,
नभ में न तारा बोलता था,
तब तेरी ममता का दीपक
निशि के अंतर में डोलता था॥
तुम अनदेखी वह सरिता हो,
जो प्यास स्वयं की पी जाती।
सूने अधरों की कंपन पर
मधु-स्मित बन चुपके झर जाती॥
तुम करुणा का सजल हिमालय,
नीरव स्नेहिल श्वेत शिखर हो।
जिसकी छाया में थका प्राण
पाता चिर-विस्मृत निज घर हो॥
तेरे लोचन के जल में माँ,
कितने स्वप्न उतरते देखे।
अपने उर की रिक्त गुफा में
तूने मेरे दिवस सहेजे॥
जब पथ कंटक से भर जाता,
जब मन अवसादों में खोता,
तब अंचल की मंद सुवासित
छाया तम से युद्ध संजोता॥
वे निषेध, वे कठोर वचन भी
अब लगते वरदानी जैसे।
दग्ध धरा पर सावन-घन के
प्रथम शीतल पानी जैसे॥
तूने कितने गीत निगलकर
मुझको स्वर का दान दिया माँ।
अपने नयनों का नील निमेष
मेरे उर में प्राण किया माँ॥
श्रम से झुका हुआ वह तन भी
दीपक-सा जलता रहता था।
“तृप्त हुआ क्या?”—इस प्रश्नों में
पूरा जीवन बहता था॥
मैंने देखा—रजनी बीती,
पर तेरी पलकों में जागी
चिन्ता की वह धूमिल रेखा,
जो बन उषा पुनः अनुरागी॥
काल-तरंगों के तट पर अब
स्मृतियाँ शंख-निनादित हैं।
बीते क्षण के सूने उपवन
तेरे पद-चिह्नों से स्पंदित हैं॥
बैठो कुछ पल आज समीप ही,
जीवन क्षणभंगुर आलोक।
कल संभव है शेष रह जाए
केवल प्रतिध्वनियों का शोक॥
माँ केवल संबोधन ही नहीं—
वह आदिम ऋचा, अनहद ध्वनि।
जिसमें जग की समस्त व्यथा भी,
और सृष्टि की प्रथम चाँदनी॥
वेदों के गंभीर पृष्ठ पर
जिसका अर्थ न पूर्ण उतर पाया,
वह माँ ही है—जिसके उर में
ईश्वर ने निज मौन छिपाया॥
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