मैं नहीं जानता
किस अदृश्य दिशा से आती है वह पुकार
जो हर दिन मेरे भीतर
एक अनाम द्वार पर दस्तक देती है;
पर इतना जानता हूँ कि
जब मैं उसे अनसुना करता हूँ,
मेरे ही कदमों की ध्वनि
मुझसे अपरिचित हो जाती है।
कर्म तब केवल क्रिया नहीं रहता,
जब उसमें किसी परिणाम का भय नहीं,
किसी पुरस्कार की आकांक्षा नहीं होती;
वह तब एक शांत नदी की भाँति
अपने ही स्रोत की खोज में बहता है।
मैं उसी प्रवाह के तट पर बैठा
अपने होने का अर्थ टटोलता रहता हूँ।
कभी लगता है
मानो आत्मा कोई उत्तर नहीं,
एक दीर्घ प्रश्न है—
जिसे जीवन निरंतर लिखता है।
मेरे श्रम की प्रत्येक रेखा
उसी प्रश्न का विस्तार बन जाती है,
और मेरे हाथों का स्पर्श
एक मौन व्याख्या में बदल जाता है।
मैंने देखा है—
दायित्व की शुष्क भूमि पर
सिर्फ़ थकान उगती है;
किन्तु जहाँ अंतःकरण का जल पहुँचता है,
वहीं अर्थ के अंकुर फूटते हैं।
वहाँ श्रम बोझ नहीं रहता,
वह अस्तित्व का स्वाभाविक संगीत बन जाता है।
शायद सत्य कोई अंतिम शिखर नहीं,
न ही कोई निश्चित उद्घोष;
शायद वह इसी यात्रा में छिपा है—
जहाँ मनुष्य अपने कर्म में
स्वयं को धीरे-धीरे पहचानता है।
और तब उसकी प्रत्येक सृजन-रेखा
उसके होने की घोषणा नहीं,
उसके होने का शांत उत्सव बन जाती है।
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