मैं हूँ—या होने की प्रतिध्वनि?
भीतर के शून्य में
कौन पुकारता है?
इस अनंत तट पर
खड़ा मैं सोचता हूँ—
क्या मेरे विश्वास
भाग्य के आकाश में
धूल हैं,या नक्षत्र?
कभी लगता है,
भीतर कोई ज्योति
मौन अक्षरों में
मेरा कल लिखती है।
एक संकेत—जो शब्द नहीं।
एक गीत—जो स्वर नहीं।
फिर संदेह उठता है—
क्या यह प्रकाश है,
या स्वप्न?
क्या मैं स्वयं को देखता हूँ,
या अपनी कल्पना को?
हर उत्तर
एक नया प्रश्न बन जाता है।
कहा जाता है—
जैसा मैं स्वयं को मानता हूँ,
वैसा ही बनता हूँ।
पर क्या विचार
सृजन करते हैं?
या केवल
प्रतिबिंबित करते हैं?
जब मैं स्वयं को
दुर्बल मानता हूँ,
मार्ग सिकुड़ जाता है।
जब विश्वास जगता है,
क्षितिज
फैलने लगता है।
पर बदलता क्या है—
जगत,
या दृष्टि?
शायद भाग्य और मैं
दो नहीं।
मैं उसे गढ़ता हूँ,
वह मुझे।
एक मौन वृत्त,
जिसका आदि भी मैं,
अंत भी मैं।
मेरे पास
निश्चय नहीं।
केवल अनुभव है।
आत्मा जिस ऊँचाई पर
स्वयं को देखती है,
जीवन भी
उधर ही मुड़ता है।
इसलिए
मैं स्वयं को सत्य नहीं,
एक संभावना मानता हूँ।
एक यात्री,
जो पथ खोजता भी है,
और रचता भी।
यदि भाग्य कहीं लिखा है,
तो उसकी स्याही में
मेरे विश्वास की
कुछ बूँदें अवश्य हैं।
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