क्या किरदार निभाते हैं कुछ रिश्ते?
जरूरत पड़ी और मुकर जाते हैं।
अपने शब्दों में जहर घोलते हैं,
और रिश्ते में दुश्मनी भी निभाते हैं।
कैसा अजब संयोग है ?
मिलने पर मीठी वाणी फूट पड़ती है,
आगे निभाने की कसमें खाते हैं।
ऐसे रिश्ते पर क्या भरोसा करें ?
जब ये अपनों के नहीं होते,
फिर ये किसको भाते हैं ?
विश्वास करने योग्य नहीं ऐसे रिश्ते,
सब इनकी खोखली बातें हैं।
-चंद्र दत्त शर्मा
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