आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब उनसे मिलने का कोई सबब ही नहीं।

                
                                                         
                            जख्म दे दिए इतने,
                                                                 
                            
कि हम अब तक उबरे ही नहीं,
ध्यान करते हैं जब उन लम्हों का,
काश वो लम्हे आते ही नहीं।
बस अब मतलब इतना ही है,
कि हम उन्हें सोच में लाते ही नहीं।
गुजर जाएगी यूं ही जिंदगी,
अब उनसे मिलने का कोई सबब ही नहीं।
-चंद्र दत्त शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर