कभी-कभी लगता है कि क्या वाकई मैं ही इस सुकून
या इस ठहराव के काबिल नहीं?
या मेरे भीतर की मिट्टी ही बंजर है जिसमें कोई. आशियाना पनप नहीं सकता?
शायद ठहराव ही मुझसे रूठा है—वह मुझे अपने आगोश में ले तो लेता है,
लेकिन एक पिंजरा बन कर!
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