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मैं जीवन के पन्ने उकेरता हूँ

jivan kew pnne ukerta hu
                
                                                         
                            फूलों की, कलियों की, भौरों की बातें ,
                                                                 
                            
खुशबू की , बदबू की, फिजाओं की यादें ,
सुख की , दुःख की , खुशियों की परतें ,
मैं अपनी बाँहों से घेर लेता हूँ ।
जीवन हूँ , मैं जीवन के पन्ने उकेर देता हूँ ।

भूख की उफान , गरीबी के फंदे ,
सच के , झूठ के , फरेब के धंधे ,
इश्वर के दूत , खुदा के बन्दे ,
सूरत के अच्छे , सीरत के गंदे ,
सबको मैं जीवन में बखेर देता हूँ ।
जीवन हूँ ,मैं जीवन के पन्ने उकेर देता हूँ ।

सुबह की , शाम की , रात की खटक ,
कौओं की काओं , बुलबुल की चहक ,
खिलंदरा बचपन, बहका सा यौवन,
बढ़ता कैअशयोर्य , संजीदा प्रोऔद्पन,
सभी को मैं पल में घेर लेता हूँ ।
जीवन हूँ मैं जीवन के पन्ने उकेर देता हूँ ।

तेरी मुस्कान , उसका क्रंदन ,
किसी की उपेक्षा , किसी का स्पंदन ,
दुष्टों का मर्दन , और देवों का वंदन ,
आंखों की शर्म और दिलों की धड़कन ,
सभी को यूँ हीं मैं छेड़ देता हूँ ।
जीवन हूँ , मैं जीवन के पन्ने उकेर देता हूँ .

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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