थक गया हूं घर जाना चाहता हूं,
बेपरवाह होके सोना चाहता हूं।
थक गई है जिंदगी मीठे लोगों से,
अब इनसे दूर रहना चाहता हूं।
स्वाद लेते लेते जीभ जल गई,
अब जीभ बचना चाहता हूं।
थक गया हूं इस उमस भरी जिंदगी से
अब मारना चाहता हूं।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X