मैंने तुझसे कभी घर का पता पूछा नहीं
दुंगी कभी आवाज ,पलटकर ,कभी सोचा नहीं ।
कशिश दिल की फिज़ाओं में कैसे घुल गई
आईना लगा कर कभी देखा नहीं।
रब ने भी कुछ तय किया होगा
आंखों में अश्रुओं को सिंचा होगा
याद नही कब सुखे आंसू मैंने कभी पोछा नहीं ।।
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