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नहीं भूलेंगे शपथ..

                
                                                         
                            १९६२ की संसद की शपथ हम भूले नहीं है
                                                                 
                            
गांव गहरे हैं और हरे हैं अभी
अरुणाचल में सावन के झूले नहीं हैं
१९७१ की सौगंध है
आओ चक्रधर मोरपंख भरो हुंकार फिर
कहो पार्थ से लगाये टंकार फिर
फिर एक बार गीता का दे देना पाठ
दिखाना अपना स्वरूप वह विराट
हम बजायेंगे रणभेरी ,तुम उठा लेना शंख
दूर करने हैं भारत भू को लगे दगाबाजी के डंक
हांकना है कृष्ण रथ, रख मुरली अधर
पार्थ ही पार्थ होंगे,जिधर भी करना नजर
राष्ट्र प्रण की बलि वेदी बनेंगी धरा
आओ चक्रधर सुदर्शन चलाओ जरा
बढ़ेगा सुदर्शन कर दुश्मनों का पतन
सुदर्शन को प्रणाम करते हैं मन से
करें गलतियों का अहसास चीन मन से।
मानसरोवर की तरंगों को छू जाएंगे हम
होली के रंगों मे झूम जाएंगे हम
सावन के झूलों की खाते हैं कसम
नहीं भूलेंगे शपथ जब तलक है दम में दम।
-ओम बजाज
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3 वर्ष पहले

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