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ग्रीन महोत्सव

                
                                                         
                            यह दरख़्त बियाबां के
                                                                 
                            
तुम काटोगे कब तलक
हिसाब तुम्हारी हर सांस का
इन्हींके पास है गिरवी
जो सांस ले रहे हो
इनका क़र्ज़ है हम पर
यह देंगे बख्शेंगे नई जिंदगी
ना इधर उधर देखेंगे , सोचेंगे ना पल भर
पहाड़ों पर खड़े हरे वृक्ष मुख मस्तक है
उदर है नदी सागर तलाव के चहुं और
बसें मखमली वन उपवन
गांव शहरों जंगलों मे लहराती
फलफुलती हरीयाली नृत्य करते पैर है
इनके आईने में मनाये अपनी खुशीयां
मनाएं जीवन का ग्रीन महोत्सव ।

ओम बजाज
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3 वर्ष पहले

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