आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

घुंघट में चांद

                
                                                         
                            चांद में दाग़ देखोगे क्या फायदा
                                                                 
                            
चांदनी का ये झरना रुकेगा नही
द्वार देहरी को, हमने सजा है दीया
सज गई टिमटिमाती, सभी सुक्तियां
आ भी जाओ क्या सुरज ढलेगा नहीं ।।
कर लो कितने ही जपतप आराधना
चाहिए एक विश्वास की बुंद भर
जो पा जाओ विश्वास की बुंद तुम
मत रुको चल पडो ,विश्वास की है डगर
पी का शिव से मिलन फिर रूकेगा नहीं ।।
ले चलो - स्वर चलें, अनहद के अनंत में
स्वरलहरियों से गुंजेगी, अंतरीक्ष की हर दिशा
चमकेगी बिजलियां,अनहद के सामने
मधुर तरंगों का बहना रूकेगा नहीं
अनंत के परम से ,संत सनेही मिलेंगे यहीं।।
मान जाओ के बैठो उठाओ पलक
क्या पलकों का नयन द्वार खुलेगा नहीं
लौ को मध्यम करो,हटाऊं घुंघट जरा
हो जाय एक, ये आकाश ओर ये धरा
मिलन चांद का चांदनी से रुकेगा नहीं।।

ओम बजाज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर