झुठी तस्वीरें खिंचवाकर
क्युं अपनो मे इतराते हो,
झुठी मुस्कानो को लेकर
क्युं अपनो मे भरमाते हो,
क्युं तुम राजघाट जाते हो
क्युं तुम पुष्प चढ़ाते हो ।।
बापू तुम हां राजघाट पर
चार दिवारी के कैदी हो,
कोई तुमसे नजर चुराकर
तुमसे ही है दुर भागता
कोई तुमपर पुष्प चढाकर
पुष्पों का हिसाब मांगता ।।
राजघाट के भीतर बैठे
गुमसुम से कुछ सोच रहे हो,
माथे पर उभरी बुंदे , हल्के हाथों से पोंछ रहे हो
केश नहीं कुछ भी माथे पर
क्युं माथे को नोच रहे हो ,
एक लाठी एक लंगोटी के संग
क्या, रामराज्य की सोच रहे हो ।।
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