आओ समंदर
बताओ समंदर
क्या यह सच है
ईश्वर बसा है हर दिल के भीतर
बन के तीर्थकंर बन के अभ्यंकर
एक सिकंदर धरती नापने अड़ा है
सामने एक सामान्य इन्सा खड़ा है
चेहरे पर है लिए कुछ लकीरें
हल्की मुस्कान के संग ज्वाला है अंदर
खुला देखता बर्बादियों का मंजर
भीतर उठ रहे सवालों पर सवाल हैं
क्युू बांटें जा रहे , खंजरों पे खंजर।
नाप लो धरती, आओ समंदर
समुद्रमंथन का , विष सारा पी लो
बांध के रामसेतु , समंदर फिर से जी लो
तप रही है धरती, आओ समंदर ।
यह कैसी चली है बर्बादियों की आंधी
यह क्यूं चल पड़ी है बेवजह की आंधी
क्या आएंगे बन के फिर पथ प्रदर्शक
कब आएंगे बन के हां पथ प्रदर्शक
गांधी से बुद्ध
बुद्ध से गांधी।।
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