आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दोगले चरित्र

                
                                                         
                            कुछ ऐसे लोग दोगले होते हैं,
                                                                 
                            
जुबान शहद की और जहर दिलों में रखते हैं,
बुद्धिमानी की तो पूछो ही मत , सारा ज्ञान इन्हीं में सिमटा है,
कि क्यों खड़े हो रहे हैं शक्ति से , ये हमें रोकने रोकते फिरते हैं ।
पहले तो अंधे हो जाते , कुछ गलत नहीं दिखता इनको ,
और जब उठे आवाज विरुद्ध अन्याय के तब अपनी टांग अड़ाते हैं,
सारी न्याय विधा इनको हो आती है , ये सारे जितने ढोंगी हैं,
देकर साथ गलत का फिर खुद को बड़ा शरीफ बताते हैं।
ज़रा गौर से सुन लो बात मेरी , तुम क्या हो हम भी जानते हैं,
हम शांत हैं तो शिव के जैसे पर तांडव भैरव वाला करते हैं।
न हम आगे से बोलते हैं न बे सिर पैर की बातें आती हैं,
लेकिन जब छेड़े कोई आके , तो आईना सच का उसे दिखाते हैं।
क्या साबित करना चाहते हो क्या कुछ सम्मान तुम्हारा बाकी है ,
क्यों शेरों से उलझे बैठे हो ,
तुम जैसों की खातिर तो हुंकार हमारी काफी है ,
वक्त है बाकी अब भी कुछ , जो सुधर गए तो अच्छा है ,
वरना कोमल भावों के संग शंकर बनकर भी लड़ सकते हैं ।
हम भक्त हैं कान्हा के तो फिर जैसे को तैसा मिलेगा ही ,
जिसने की गलती जो भी , एक न एक दिन झुकेगा ही ।
बुजदिल हो तुम कायर सारे जो छुपकर वार करते रहते हैं,
हैं सांप से भी वो जहरीले , जो जुबां शहद की और जहर दिलों में रखते हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर