मैंने पूछा, "किसने मुझे बनाया?"
सबने बोला, "ऊपर वाले ने है बनाया।"
जा पहुँचा मैं ऊपर वाले के पास, मुझे लगा उसमें होगा कोई खास।
वो कमरा तो था खाली,
मुझे लगा शायद पद है खाली, कुछ समय बाद निकलेगी बहाली।
तभी कमरे में मिली चिट्ठी, उस पर लिखा था— "मुझे किसने है बनाया?"
तब मैं तिरछी काट कर बाहर आया।
कुछ दिन बाद मेरी जिज्ञासा पिता जी के पास आई,
बिना बोले, जूतों से शाबाशी मैंने पाई।
लौट आया अपने संकुचित संसार में, खो गया अपने विचार में।
तभी आकाशवाणी हुई— "इंसान की ही सोच ने क्या ऊपर वाले की दुनिया बनाई?"
चूंकि मैं इंसान न...
इसलिए अपने फर्ज़ का पालन करने का अधिकार नहीं रखता हूँ।
इंसानों की बात मैंने मान ली, मैंने भी उस ऊपर वाले को चाय पिलानी ठान ली।
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