आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तिरछी काट

                
                                                         
                            मैंने पूछा, "किसने मुझे बनाया?"
                                                                 
                            
सबने बोला, "ऊपर वाले ने है बनाया।"
जा पहुँचा मैं ऊपर वाले के पास, मुझे लगा उसमें होगा कोई खास।
वो कमरा तो था खाली,
मुझे लगा शायद पद है खाली, कुछ समय बाद निकलेगी बहाली।
तभी कमरे में मिली चिट्ठी, उस पर लिखा था— "मुझे किसने है बनाया?"
तब मैं तिरछी काट कर बाहर आया।
कुछ दिन बाद मेरी जिज्ञासा पिता जी के पास आई,
बिना बोले, जूतों से शाबाशी मैंने पाई।
लौट आया अपने संकुचित संसार में, खो गया अपने विचार में।
तभी आकाशवाणी हुई— "इंसान की ही सोच ने क्या ऊपर वाले की दुनिया बनाई?"
चूंकि मैं इंसान न...
इसलिए अपने फर्ज़ का पालन करने का अधिकार नहीं रखता हूँ।
इंसानों की बात मैंने मान ली, मैंने भी उस ऊपर वाले को चाय पिलानी ठान ली।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर