जितनी ख़बर होती जा रही है दुनिया की,
उतना ही ख़ुद को क़ैद करती जा रही हूँ
इस चारदीवारी में...
क्या ही कोई रोकेगा या टोकेगा मुझे?
मैं ख़ुद ही अपनी उड़ान को
क़ैद करती जा रही हूँ
इस चारदीवारी में...
जो एक बेपरवाह-सा मन था मेरा,
अब उलझ गया है कहीं डर के दलदल में,
शायद अब इस मन को भी
क़ैद करती जा रही हूँ
इस चारदीवारी में...
ऐसा नहीं कि उठती नहीं हूँ,
या चलने की कोशिश नहीं करती,
बस हर कोशिश की एक सीमा
तय-सी कर दी है मैंने,
अब अपने क़दमों को भी
क़ैद करती जा रही हूँ
इस चारदीवारी में...
क्या है इसका उपाय?
कोई तो सुझा दे मुझे,
इस ढलती, सहमी-सी ज़िंदगी से
आज़ाद करा दे मुझे...
क्यों अब अपने मुकम्मल को भी
क़ैद करती जा रही हूँ
इस चारदीवारी में...
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