आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बचपन कहाँ चला गया

                
                                                         
                            बचपन कहाँ चला गया
                                                                 
                            

याद आती है हमें
बचपन की वो घड़ियाँ,
बच्चों की किलकारियों से
गूँजा करती थीं गलियाँ।

मिट्टी के खिलौनों में
छिपी रहती थीं हमारी नादानियाँ,
दादी की ज़ुबाँ से रोज़
सुना करती थीं नई-नई कहानियाँ।

न खिलौनों की कोई चाह थी,
न ही किसी बात की परवाह थी,
बस दोस्तों का साथ ही
हमारे जीवन की एक मिठास थी।

मगर आज बचपन
जा रहा है कहाँ?
मोबाइल की स्क्रीन पर,
या रील्स और वीडियोज़ के सीन पर।

नहीं मिलते हैं माटी के खिलौने
अब बाज़ारों में,
और न ही सुनाई देती हैं
दादी की कहानियाँ अब रातों में।

मैदानों का वो शोर
मौन हो चुका है,
और दोस्तों का झुंड
अब ग़ायब हो चुका है।

घर की चारदीवारी में
सिमट चुका है बचपन,
व्हाट्सऐप की चैट पर
बिखर रहा है जीवन।

क्या पता किस मोड़ पर
छूट गईं वो नटखट शरारतें,
कहाँ खो गई है वो बेफिक्र हँसी
और मासूम आदतें।

अब भी वक्त है हमें
अपने बचपन को वापस लाने का,
छोड़कर स्क्रीन की दुनिया,
अपनी ज़मीन और मिट्टी से जुड़ जाने का।
— नूतन झा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर