मेरे दिल के कितने क़रीब हैं आप।
कभी शरवरी, तो कभी शबनम लगती हैं आप,
दिलनशीं और दिलफ़रेब हैं आप।
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ कि
मेरे दिल के कितने क़रीब हैं आप।
शादाब-सा चेहरा, गुलों-सा निखार हैं आप।”
सोंधी-सी ख़ुशबू बनकर रूह में उतरती हैं आप।”
लफ़्ज़ों में कैसे बयाँ करूँ
मेरे दिल के कितने क़रीब हैं आप।
चाँद की चाँदनी,
परिंदों का नग़मा हैं आप।
अल्फ़ाज़ों से परे,
हुस्न की एक मिसाल हैं आप।”
लफ़्ज़ों में कैसे बयाँ करूँ,
मेरे दिल के कितने क़रीब हैं आप।
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