आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

यहाँ फ़क़ीर के पहले-पहल गुलाम थे हम

                
                                                         
                            हैं आज शाह प पहले यहीं गुलाम थे हम
                                                                 
                            
तुम्हारी सुब्ह से पहले किसी की शाम थे हम

बदन तो बाद का हासिल है कुछ बरस पहले
यक़ीन मानिए आँसू थे इंतिक़ाम थे हम

इसी हुनर से लड़ाई लड़े औ जीते भी
जो दंड-भेद था कोई तो साम-दाम थे हम

अजीब खेल है दौलत का कामयाबी का
कुबूल आज हैं पहले यहाँ हराम थे हम

अजीब धुन मिरे सर पर सवार थी मौला
यहाँ फ़क़ीर के पहले-पहल गुलाम थे हम
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर