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किसी की इक नज़र आँखों में रख कर

                
                                                         
                            सुनाई जाए गर आँखों में रख कर
                                                                 
                            
कहानी मुख़्तसर आँखों में रख कर

सभी मंज़िल की जानिब चल पड़े हैं
निकलते वक़्त घर आँखों में रख कर

मुहाजिर की तरह देखा है तुम ने
कभी इक रह-गुज़र आँखों में रख कर

बनाया है नया इक घोंसला भी
परिंदों ने शजर आँखों में रख कर

मुसलसल नींद को चकमा दिया है
कि आँसू और डर आँखों में रख कर

गली कर दी है पैरों के हवाले
तुम्हारा बाम-ओ-दर आँखों में रख कर

मैं सारी रात सूरज देखता हूँ
किसी की इक नज़र आँखों में रख कर

नहीं देखा कभी पाकीज़गी से
किसी को उम्र-भर आँखों में रख कर

बनाई थी नदी कैसे बताओ
कि तुमने बूँद-भर आँखों में रख कर

मुसाफ़िर अब नहीं भूलेंगे रस्ता
चले हैं राहबर आँखों में रख कर

बदन में बो दिया जाता है दिन में
समुंदर रात-भर आँखों में रख कर
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6 घंटे पहले

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