रौनक़-ए-दिल को यूँ नाशाद करने के लिए
आशिक़ों की दुगनी तादाद करने के लिए
खेल कर औरों से जब दिल भरा उनका नहीं
आ गए फिर हमको बर्बाद करने के लिए
ज़ख़्म देकर पूछते हैं क्या ज़िंदा हो अभी
लो चले आए हैं इमदाद करने के लिए
ग़म के दरिया में डुबो कर गए हमको कहीं
आए थे जो मंज़र आबाद करने के लिए
बेअसर हो ही गईं ख़ुद हमारी आहें भी
अब बचा ही क्या है फ़रियाद करने के लिए
दफ़्न-ए-दर्द-ए-इश्क़ का शहर को दे दो पता
दिल बड़ा कर ही लो इरशाद करने के लिए
इल्म लाज़िम है मगर, साथ हो फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा
शाइरी में ख़ुद को उस्ताद करने के लिए
सब ख़सारा करके दिल ही 'अज़ल' उकता गया
तब चले हैं ख़ुद को आज़ाद करने के लिए
- निशान्त शुक्ल 'अज़ल'
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