कुछ अपूर्ण सा लगता है
जब चिर-स्थायी एकांत में,
बैठे हो बिल्कुल शांत में,
जब खोई स्मृति क्लांत में,
जब उगता सूरज ढलता है,
कुछ अपूर्ण सा लगता है।
जब कर्मों का न मिले परिणाम,
एक पल का भी न मिले विराम,
अंतर्मन में मचे कोहराम,
जब प्रश्न तुम्हारी क्षमता पर हो,
कुछ अपूर्ण सा लगता है।
जब प्रेम को अपमान मिले,
हर कार्य में व्यवधान मिले,
जब अयोग्यों को सम्मान मिले,
जब विस्तृत सागर कुछ कहता है,
कुछ अपूर्ण सा लगता है।
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