रात चांद का छत पर से
मुस्कुरा कर गुजर जाना
मेरे तृप्त मन को
बेकल कर गया;
अपने खुशहाल जीवन में
वह बड़ी मगन थी;
बड़ी सुखद गुजर
रही थी जिंदगी |
ख्वाहिशों को दफन कर
खुद से सवाल कर
ये कैसी गुजर रही है जिंदगी ?
पूरे घर में बंटी
खंड-खंड सी
वह खुद कहां थी ?
आज उसे जाने क्यों
ये एहसास हुआ;
बरसों पहले देखा
वह ख्वाब !
फिर से दिल में
कुल -बुलाने लगा !
वह हर्ष-उल्लास की जिंदगी
उसे अब
अंजान सी लगने लगी ;
विरक्त हो अपनी ही जिंदगी
उसे अब
पिंजरा सी लगने लगी ;
और
वह उसमें बंद कैदी सी।।
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