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माँ गुस्सा थी

                
                                                         
                            मां गुस्सा थी
                                                                 
                            
मना लूंगा
जरा सा प्यार भरा लम्हा
जज्बाती हो
मां झट मान जाएगी |

पर तू तो सच में
रूठ कर चली गई मां
अभी तो
करनी थीं कुछ
अभी तो
कहनी थी कुछ
मन की बातें ;

तू बड़ी जल्दी चली गई माँ
तेरी गोद में कर रख
वह प्यार की बातें
तुझे संग अपने ले जाना था
फिर से अपना बचपन जीना था |

तूने ही तो किया था
खुद से न्यारा
पहले पढ़ने
फिर अपनी
जिंदगी जीने
सात समंदर पार
भेज दिया था विदेश |

आते आते
जिंदगी जमाते जमाते
कई बरस लग गए |

पर तू तो बड़ी जल्दी चली गई मां
साथ में मेरे सारे सपने
अपने साथ ले गई |

मेरे हिस्से के
प्यार की सौगात भी
अपने साथ ले गई |

आंखों में आंसू भर
मेरे होठों की मुस्कान भी
अपने साथ ले गई |

अपनी सांसों के साथ
मेरी धड़कने भी ले गई ||
-नरेश निशा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

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