उसकी क्या खता भला
फूल की भी अपनी किस्मत,
शाखा से जुड़कर ही थी अस्मत।
राजा - सी थी शान - बान,
हर पंखुड़ी में थी जान - मुस्कान।
एक बार जरा क्या अलग हुआ,
वजूद का न फिर अता - पता।
गले का हार बना या वरमाला,
सजा गजरा या फिर सेहरा बन।
चढ़ा देवता या फिर अर्थी पर,
या पैरों तले रौंद दिया गया।
उसको क्या पता भला,
इसमें उसकी क्या खता भला।
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