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स्वतंत्र हो विचरने दो

                
                                                         
                            माॅं,बहन,बेटी,भार्या बन,संवार दिया सब का जीवन।
                                                                 
                            
अन्नपूर्णा का बेड़ियों में जकड़ा, क्यों सारा जीवन।।

नारी का सम्मान नहीं, सिर्फ जिस्म ही समझा जाता है।
जिस कन्या को पूजा जाता, उसे ही कुचला जाता है।।

रात हो या दिन हो, वक्त का कोई भी पहर हो।
स्वतंत्र हो विचरने दो, वक्त का कोई न डर हो।।

खिलने दो, बढ़ने दो, उन्मुक्त गगन में उड़ने दो।
धरती,अंबर,दुनियॉं सारी,कण-कण की अधिकारी नारी।।

धरा- सी सहनशक्ति, तन-मन में सशक्त शक्ति।
ज्ञान की महान शक्ति, नारी है जननी की शक्ति।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले

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