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स्वार्थी

                
                                                         
                            सब जानकर भी अनजान बने रहते हैं।
                                                                 
                            
औरों पे हंसते हैं बस अपने लिए जीते हैं।।

हंसने और मुस्कुराने की वजह गलत देते हैं।
आंसुओं और रोने में भी मजा लेते हैं।।

दोस्ती और दोस्ताना जरा न समझ पाते हैं।
दर्द देने की बस वज़ह ढूढ़ा करते हैं।।

सजने - सवंरने में भी चुहलबाजी करते हैं।
सीधे - सरल स्वभाव को स्वार्थी बना देते हैं।।

जिंदगी को खुलकर जीने नहीं देते हैं।
मरने पर भी बातें तमाम करते हैं।।

जिंदगी का फलसफा न कभी समझते हैं।
सब जान कर भी अनजान बने रहते हैं।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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