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स्त्री

                
                                                         
                            स्त्री, श्रद्धा है, विश्वास है,
                                                                 
                            
स्त्री,ज्योति है, साहस है।

करती अपना सर्वस्व अर्पण,
कोमल हृदय का वो दर्पण।

रग-रग उसका ममता-भरा,
कतरा - कतरा वफा-भरा।

हर जख्म हँसकर सह जाती,
पर कर्तव्यों का पालन करती।

सहनशक्ति की शिला निराली,
पर वक्त पड़े तो दुर्गा, काली।

रिश्तों की वो भक्ति करती,
हर रिश्ते में खुशियाँ भरती।

स्त्री, श्रद्धा है,विश्वास है,
स्त्री, जीवन की मिठास है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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